Published On: Sat, Aug 29th, 2015

खतरे की सरहद (जनसत्ता)

एक बार फिर पाकिस्तान की ओर से हुई गोलाबारी ने संघर्ष विराम को पलीता लगा दिया। शुक्रवार को तड़के हुई इस गोलाबारी से आरएस पुरा सेक्टर में दो भारतीय नागरिकों की जान चली गई और दर्जन भर लोग घायल हो गए। कई बार घुसपैठ कराने के लिए भी पाकिस्तान रेंजर्स के जवान गोलाबारी शुरू कर देते हैं। संघर्ष विराम समझौते के उल्लंघन का ताजा वाकया ऐसे समय हुआ जब भारत के सीमा सुरक्षा बल और पाकिस्तान रेंजर्स के महानिदेशकों की बैठक तय हो चुकी है। क्या गोलीबारी के पीछे इरादा इस बैठक को नाकाम करने या उससे कदम पीछे खींचने का हो सकता है? इस अनुमान की गुंजाइश इसलिए बनती है कि बातचीत या शांति-प्रयास की कोई पहल होने पर आतंकवादी हमले या संघर्ष विराम से उलट घटनाएं बहुत बार हुई हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक के आसार जब दिखने लगे थे, तभी गुरदासपुर और ऊधमपुर की आतंकी घटनाएं हुर्इं। इनमें एक हमलावर नवेद जिंदा पकड़ लिया गया था, जो पाकिस्तान से ऐसे हमलों के तार जुड़े होने का सबूत है। अब कश्मीर में अपने दो दिन के अभियान में सेना ने तीन आतंकियों को मार गिराने के साथ ही एक और आतंकी को जिंदा पकड़ा है, जिसकी पहचान दक्षिण-पश्चिम पाकिस्तान के सज्जाद अहमद के रूप में हुई है। जब भी ऐसे सबूत और तथ्य पाकिस्तान के सामने पेश किए जाते हैं, उसका जवाब होता है कि ये तत्त्व उसकी नुमाइंदगी नहीं करते, राज्य-व्यवस्था से बाहर के किसी घटक के लिए वह कैसे जवाबदेह माना जा सकता है। मगर संघर्ष विराम विरोधी वाकयों में तो सीधे फौज का हाथ है। यह क्यों हो रहा है? इसका उत्तर पाकिस्तान के पास पहले भी नहीं था, अब उसने जवाब प्रत्यारोप में निकाला है।
पाकिस्तान ने संघर्ष विराम उल्लंघन का ठीकरा भारत पर फोड़ा है। इसके लिए उसके विदेश मंत्रालय ने भारतीय उच्चायुक्त को तलब भी किया। यह कवायद अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के बीच गफलत पैदा करने की कोशिश के सिवा और क्या हो सकती है! सच तो यह है कि पाकिस्तान की तरफ से संघर्ष विराम को तोड़ने की घटनाएं पिछले तीन-चार साल में बढ़ती गई हैं। वर्ष 2010 में ऐसी चौवालीस घटनाएं हुई थीं, इसके अगले साल इक्यावन और फिर उसके बाद के साल में तिरानबे। वर्ष 2013 में यह आंकड़ा तीन सौ सैंतालीस और पिछले साल पांच सौ तिरासी पर जा पहुंचा। इस साल जून तक ऐसी दो सौ घटनाएं हुर्इं। ऐसे सिलसिले की एक वजह यह मानी जाती है कि पाकिस्तानी फौज वहां की सरकार का कहा नहीं मानती।
यह बात सही होगी, पर किस हद तक, कहना मुश्किल है। दरअसल, वहां का राजनीतिक नेतृत्व भी दो कारणों से जब-तब तनाव पैदा करने से गुरेज नहीं करता। एक तो कश्मीर विवाद की तरफ दुनिया का ध्यान खींचने की गरज से, और दूसरे, अपनी आंतरिक समस्याओं से अपने लोगों का ध्यान बंटाने के लिए। कुछ दिन पहले पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने कहा था कि संघर्ष विराम समझौते का उल्लंघन रोकने के लिए एक प्रभावी प्रणाली की जरूरत है। यह समझौता नवंबर 2003 में लागू हुआ था। तब से ऐसे भी कुछ बरस रहे, जब समझौते के उल्लंघन की घटनाएं बहुत कम हुर्इं। लिहाजा, असली सवाल प्रणाली का नहीं, समझौते को लेकर संजीदगी का है।

सौजन्य:जनसत्ता (29-08-2015)

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